सत्य निकेतन में PG बिल्डिंग ढही: कई लोगों की मौत, रेस्क्यू ऑपरेशन जारी; सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
A PG building collapsed in Delhi’s Satya Niketan area, killing several people and leaving others injured. Rescue teams launched an extensive operation after people were feared trapped under the debris. Questions are being raised over the building’s age, construction activity and compliance with safety norms, along with the monitoring of old and potentially unsafe buildings in Delhi.
दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके से सोमवार को एक दर्दनाक हादसे की खबर सामने आई, जहां एक PG के तौर पर इस्तेमाल हो रही बहुमंजिला इमारत अचानक भरभराकर गिर गई। हादसे के वक्त इमारत के अंदर कई लोग मौजूद थे, जिसके बाद कुछ लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जताई गई। सूचना मिलते ही दिल्ली पुलिस, दमकल विभाग, NDRF और दूसरी राहत-बचाव एजेंसियां मौके पर पहुंचीं और बड़े स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया। रेस्क्यू टीमों ने मलबे को सावधानी से हटाकर लोगों की तलाश की। इस हादसे में अब तक कई लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि कई घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। राहत और बचाव अभियान के दौरान आसपास के इलाके में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी और बचावकर्मी तैनात रहे। हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह इमारत अचानक गिरी कैसे? शुरुआती जानकारी के मुताबिक इमारत काफी पुरानी थी और इसकी उम्र करीब 40 से 50 साल बताई जा रही है। रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि बिल्डिंग के बेसमेंट में मरम्मत या निर्माण से जुड़ा काम चल रहा था। इसी दौरान इमारत का बड़ा हिस्सा अचानक ढह गया। हालांकि, हादसे की असली वजह अभी जांच का विषय है। प्रशासन और पुलिस की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि बिल्डिंग की संरचना कमजोर थी, निर्माण कार्य में किसी तरह की लापरवाही हुई या फिर कई कारणों ने मिलकर इस हादसे को जन्म दिया। इस घटना ने दिल्ली में पुरानी इमारतों और PG में बदल चुके मकानों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सत्य निकेतन दिल्ली का ऐसा इलाका है जहां बड़ी संख्या में छात्र और युवा PG में रहते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के आसपास होने के कारण यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आए छात्र किराए के कमरों और PG में रहते हैं। ऐसे में किसी PG बिल्डिंग का इस तरह गिरना सिर्फ एक इमारत के ढहने का मामला नहीं है। यह उन हजारों परिवारों की चिंता से जुड़ा सवाल है, जो अपने बच्चों को पढ़ाई और नौकरी के लिए दिल्ली भेजते हैं। हादसे के बाद MCD की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। शुरुआती जांच में बिल्डिंग के निर्माण और नियमों से जुड़े कथित उल्लंघनों की जानकारी सामने आई है। अब जांच एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि इमारत का निर्माण और इस्तेमाल किन नियमों के तहत हो रहा था और क्या संबंधित विभागों की ओर से समय-समय पर इसकी जांच की गई थी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर इमारत में नियमों का उल्लंघन था या वह रहने के लिहाज से असुरक्षित थी, तो उस पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घटनास्थल का जायजा लिया और अधिकारियों से राहत एवं बचाव अभियान की जानकारी ली। सरकार की ओर से जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिया गया है। लेकिन हादसे के बाद कार्रवाई का भरोसा अपनी जगह है और हादसा होने से पहले सुरक्षा सुनिश्चित करना अपनी जगह। यही वजह है कि अब सिर्फ इस एक इमारत की जांच काफी नहीं मानी जा सकती। सत्य निकेतन और दिल्ली के दूसरे इलाकों में चल रहे PG, पुराने मकानों और बहुमंजिला इमारतों की सुरक्षा की व्यापक जांच की जरूरत सामने आ रही है। खास तौर पर उन इमारतों की जांच जरूरी है जिनमें बड़े स्तर पर छात्र या किरायेदार रहते हैं और जहां बिना उचित अनुमति के निर्माण या बदलाव किए जाने की आशंका है। इस हादसे ने दिल्ली की शहरी व्यवस्था के सामने एक पुराना लेकिन बेहद गंभीर सवाल फिर खड़ा कर दिया है—क्या प्रशासन हादसा होने के बाद ही जागेगा? दिल्ली में पुरानी इमारतों की पहचान, उनकी structural safety की जांच, अवैध निर्माण पर कार्रवाई और खतरनाक इमारतों को खाली कराने की व्यवस्था पहले से मौजूद है। लेकिन किसी व्यवस्था की असली परीक्षा कागज पर नहीं, बल्कि जमीन पर होती है। अगर किसी इमारत में लंबे समय से लोग रह रहे हैं, वहां निर्माण या मरम्मत का काम हो रहा है और फिर भी उसकी सुरक्षा को लेकर समय रहते कोई कार्रवाई नहीं होती, तो हादसे के बाद सिर्फ दोषियों की तलाश करना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि निगरानी व्यवस्था कहां विफल हुई। सत्य निकेतन में हुआ हादसा 2022 की उस घटना की याद भी दिलाता है, जब इसी इलाके में एक निर्माणाधीन इमारत गिरने से मजदूरों की मौत हुई थी। इसके बाद भी अगर इलाके में इमारतों की सुरक्षा को लेकर सवाल बने हुए हैं, तो यह प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी है। हालांकि अभी इस हादसे की जांच पूरी नहीं हुई है और किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराना जल्दबाजी होगी। पुलिस और संबंधित एजेंसियां मलबे, निर्माण कार्य और बिल्डिंग की संरचना से जुड़े सबूतों की जांच कर रही हैं। लेकिन इस हादसे से एक बात साफ है—दिल्ली में सिर्फ नई इमारतों की नहीं, बल्कि उन पुरानी इमारतों की भी नियमित जांच जरूरी है जिन्हें समय के साथ PG, हॉस्टल या व्यावसायिक इस्तेमाल में बदल दिया गया है। सरकार के सामने अब दो जिम्मेदारियां हैं। पहली, हादसे में प्रभावित लोगों और उनके परिवारों को हर संभव मदद देना। दूसरी, यह सुनिश्चित करना कि ऐसी घटना दोबारा न हो। किसी परिवार के लिए इससे बड़ा डर क्या होगा कि उनका बेटा या बेटी जिस PG में रह रहा है, वही इमारत अचानक गिर जाए। इसलिए इस हादसे की जांच सिर्फ यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि बिल्डिंग क्यों गिरी। यह भी पता चलना चाहिए कि बिल्डिंग की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी, उसकी जांच कब हुई थी, निर्माण या मरम्मत के लिए क्या अनुमति थी और अगर नियमों का उल्लंघन हुआ था तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई। सत्य निकेतन हादसे ने एक बार फिर दिल्ली की बिल्डिंग सेफ्टी और प्रशासनिक निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब लोगों की नजर इस बात पर होगी कि सरकार और MCD इस मामले में सिर्फ कार्रवाई का ऐलान करती हैं या दिल्ली की दूसरी संवेदनशील इमारतों की भी व्यापक जांच शुरू होती है। क्योंकि हादसे के बाद मलबा हटाया जा सकता है… घायलों का इलाज कराया जा सकता है… मुआवजा दिया जा सकता है… लेकिन जो जान चली गई, उसे वापस नहीं लाया जा सकता। इसलिए असली जवाबदेही यही होगी कि अगली बार किसी परिवार को ऐसा फोन न सुनना पड़े कि जिस इमारत में उनका अपना रह रहा था, वह गिर गई।