त्योहारी सीजन से पहले दिल्ली के बाज़ारों में सन्नाटा

दिल्ली के व्यापारिक संगठनों के ताजा दावों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में बाजारों की कारोबारी गतिविधियां लगभग 70 प्रतिशत तक गिर गई हैं। यह स्थिति बताती है कि सड़कों पर लगने वाली पा

 **नवरात्रि से दिवाली तक बड़े प्रदर्शनों पर रोक की मांग**

नई दिल्ली। कांग्रेस और CJP के प्रदर्शनों के चलते दिल्ली में लगी यातायात पाबंदियों और सुरक्षा इंतज़ामों का असर अब राजधानी के बाज़ारों पर साफ दिखने लगा है। व्यापारियों का कहना है कि ग्राहकों की आवाजाही घट गई है और दूसरे शहरों से खरीदारी के लिए आने वाले छोटे व्यापारियों की संख्या भी कम हुई है। त्योहारों के मौके पर जब बिक्री बढ़नी चाहिए थी, कई बाज़ारों में सन्नाटा पसरा है।

**CTI का दावा: तीन दिन में 70% गिरावट**

चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) ने 9 अक्टूबर को जारी अपने सर्वे के आधार पर कहा कि पिछले तीन दिनों में दिल्ली के बाज़ारों की कारोबारी गतिविधियों में करीब 70 प्रतिशत की गिरावट आई है।

संगठन के अनुसार, दिल्ली से बाहर के ग्राहकों की संख्या सामान्य दिनों के 2 से 3 लाख प्रतिदिन के अनुमान से घटकर करीब 40,000 से 50,000 रह गई है। स्थानीय बाज़ारों में भी ग्राहकों की आवाजाही 50 प्रतिशत से ज़्यादा कम होने का दावा किया गया है।

![](/uploads/articles/webp/1791708546848-197f4fb69ab1b815.webp)

**नवरात्रि से दिवाली तक अहम सीजन**

व्यापारियों की चिंता की सबसे बड़ी वजह समय है। 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू हो रहे हैं। इसके बाद रामलीला, दशहरा, दिवाली और शादी-ब्याह का सीजन आता है। इस दौरान कपड़े, साड़ियां, रेडीमेड गारमेंट, जूते, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, सजावटी सामान, पूजा सामग्री, आभूषण और उपहारों की मांग बढ़ जाती है।

दिल्ली के बाज़ार केवल स्थानीय ग्राहकों पर निर्भर नहीं हैं। देश के कई शहरों और कस्बों से छोटे व्यापारी थोक खरीदारी के लिए यहां आते हैं और माल अपने इलाकों में बेचते हैं। यानी दिल्ली के थोक बाज़ारों की सुस्ती का असर दूसरे राज्यों के खुदरा कारोबार पर भी पड़ सकता है। दुकानदार भी इसी सीजन के लिए पहले से स्टॉक जमा करते हैं, कर्मचारियों का इंतज़ाम करते हैं और छूट व सेल की तैयारी करते हैं।

**दुकानों में माल, पर खर्च जारी**

व्यापारियों का कहना है कि ग्राहक न आने पर माल दुकानों में पड़ा रहेगा, जबकि किराया, कर्मचारियों का वेतन, बिजली, परिवहन और स्टॉक में फंसी पूंजी की लागत फिर भी चुकानी पड़ेगी।