माटी के हाथों से रोशन अयोध्या: दीपोत्सव और अंत्योदय का उजाला
अयोध्या दीपोत्सव में माटी के दीये बनाने वाले कुम्हारों और शिल्पकारों के योगदान को सम्मानित करने की प्रेरक पहल। उत्सव की जगमगाहट के बीच पारंपरिक कला और मिट्टी के पुजारियों का गौरव।
**तमसो मा ज्योतिर्गमय'**, यानी अंधकार से प्रकाश की ओर। यह प्रकाश जब किसी साधनहीन के आंगन में आत्मनिर्भरता बनकर उतरता है, तब उसकी आभा कई गुना बढ़ जाती है।
इस वर्ष अयोध्या में सरयू तट पर 30 लाख दीप जगमगाएंगे। इसके लिए 33 लाख दीयों का आदेश दिया गया है। यह आयोजन अब केवल धार्मिक परंपरा नहीं रहा। यह उन कुम्हारों के लिए अवसरों का नया आकाश बन गया है, जिनके चाक की गति आधुनिकता की दौड़ में मंद पड़ने लगी थी।
### **पलायन थमा, चाक फिर घूमे**
एक दशक पहले यह हुनर दम तोड़ रहा था। रोजगार की तलाश में कुम्हार महानगरों की ओर जाकर अकुशल मजदूर बन रहे थे। एक जिला-एक उत्पाद जैसी पहल और दीपोत्सव के विराट स्वरूप ने इस पलायन को रोका। जो युवा गांव छोड़ गए थे, उनमें से अधिकांश अपनी जड़ों की ओर लौट आए हैं। जब बेटा पिता के साथ चाक पर बैठता है और दोनों की कमाई एक ही आंगन में लौटती है, तब संस्कृति और अर्थव्यवस्था की दूरी मिट जाती है।

### **लाभ का विकेंद्रीकरण**
इतने दीये किसी एक जिले में नहीं बन सकते थे। इसलिए गोंडा, बस्ती, गोरखपुर, आजमगढ़ से लेकर बुंदेलखंड तक के कुम्हार इस आयोजन से जुड़े हैं। 'लोकल फॉर वोकल' और 'आत्मनिर्भर भारत' का यह जीवंत उदाहरण है। माटी कला बोर्ड, इलेक्ट्रिक चाक और सुनिश्चित बाजार ने बिचौलियों की भूमिका घटाई है और श्रम को उचित मूल्य का रास्ता दिया है।
### **सम्मान की स्वीकृति**
अयोध्या का दीपोत्सव गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है, और इसके सच्चे हिस्सेदार वे कुम्हार हैं जिनके गढ़े दीये घाटों को आलोकित करते हैं। जो कभी समाज के हाशिये पर थे, वे आज विश्व रिकॉर्ड वाले आयोजन के सीधे भागीदार हैं। मूर्तियां, शोपीस और कुल्हड़ की चाय तक, माटी कला नई पीढ़ी के आत्मगौरव से जुड़ रही है।
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